पंच बद्री हिन्दू धर्म के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिने जाते हैं। ‘श्रीबद्री नारायण’, ‘आदि बद्री’, ‘वृद्ध बद्री’, ‘योग-ध्यान बद्री’ और ‘भविष्य बद्री’ को ही ‘पंच बद्री’ कहा गया है। देवभूमि उत्तराखण्ड में बद्री-केदार धाम का जितना महात्म्य है, उतना ही पंच बद्री और पंच केदार का भी है। असल में ये मन्दिर भी बद्री-केदार धाम के ही अंग हैं। हालांकि इनमें से कुछ स्थल साल भर दर्शनार्थियों के लिए खुले रहते हैं, लेकिन शेष में चारधाम के समान ही कपाट खुलने व बंद होने की परंपरा है।
पाँच बद्री
पंच बद्री में निम्नलिखित पाँच तीर्थ स्थलों को सम्मिलित किया जाता है-

श्रीबद्री नारायण

समुद्र के तल से लगभग 3133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है बद्रीनाथ धाम। माना जाता है कि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में इसका निर्माण कराया था। वर्तमान में शंकराचार्य की निर्धारित परंपरा के अनुसार उन्हीं के वंशज नंबूदरीपाद ब्राह्मण भगवान बद्रीविशाल की पूजा-अर्चना करते हैं। बद्रीनाथ की मूर्ति शालग्रामशिला से बनी हुई, चतुर्भुज ध्यान मुद्रा में है। कहा जाता है कि यह मूर्ति देवताओं ने नारदकुण्ड से निकालकर स्थापित की थी। सिद्ध, ऋषि, मुनि इसके प्रधान अर्चक थे। जब बौद्धों का प्राबल्य हुआ, तब उन्होंने इसे बुद्ध की मूर्ति मानकर पूजा आरम्भ की। शंकराचार्य की प्रचार यात्रा के समय बौद्ध तिब्बत भागते हुए मूर्ति को अलकनन्दा में फेंक गए। शंकराचार्य ने अलकनन्दा से पुन: बाहर निकालकर उसकी स्थापना की। तदनन्तर मूर्ति पुन: स्थानान्तरित हो गयी और तीसरी बार तप्त कुण्ड से निकालकर रामानुजाचार्य ने इसकी स्थापना की।

आदि बद्री

कर्णप्रयाग-रानीखेत मार्ग पर आदि बद्री अवस्थित है। यह तीर्थ स्थल 16 मन्दिरों का एक समूह है, जिसका मुख्य मन्दिर भगवान विष्णु को समर्पित है। मन्दिर समूह के सम्मुख एक जल धारा, जो ‘उत्तर वाहिनी गंगा’ के नाम से प्रसिद्ध है, प्रवाहित होती है। माना जाता है कि यह तीर्थ स्थल गुप्त काल में आदि शंकराचार्य ने स्थापित किया था।

वृद्ध बद्री

बद्रीनाथ से आठ कि.मी. पूर्व 1380 मीटर की ऊंचाई पर अलकनंदा नदी की सुरम्य धारों में स्थित है वृद्ध बद्री धाम। इस मन्दिर की ख़ासियत इसका साल भर खुले रहना है। इसे पांचवां बद्री कहा गया है।

योग-ध्यान बद्री

जोशीमठ से 20 कि.मी. दूर और 1920 मीटर की ऊंचाई पर ‘पांडुकेश्वर’ नामक स्थान पर स्थित हैं तृतीय योग-ध्यान बद्री। पांडु द्वारा निर्मित इस मन्दिर के गर्भगृह में कमल के पुष्प पर आसीन मूर्तिमान भगवान योगमुद्रा में दर्शन देते हैं।

भविष्य बद्री

समुद्र के तल से 2744 मीटर की ऊंचाई पर तपोवन से चार कि.मी. पैदल मार्ग की दूरी पर भविष्य बद्री है। कहा जाता है कि अगस्त्य ऋषि ने यहाँ तपस्या की थी। लेकिन विकट चढ़ाई के कारण शारीरिक रूप से फिट यात्री ही यहाँ तक पहुँच पाते हैं।

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